CBSE Revised Date sheet 2025-26 : What has actually changed?

All Class 10th, 12th CBSE board students have started their preparations, and the CBSE board has made some changes to the exam date sheet, which are very important for you to know.

In this article, you will learn about the changes in the date sheet and the reasons behind them in simple terms, so you won’t need to read any other videos or articles. You will also find answers to some important questions that will help you in your exams.

Why was CBSE Board Exam Date Sheet changed?

Many of you students are probably wondering why the date sheet was changed, but there’s a significant reason behind this change: “Festival Holidays.”

Yes, because while preparing the date sheet, the CBSE board mistakenly scheduled a paper on the day of the “Holi” festival in March, and it was necessary to make the change in time.

CBSE Board Exam Old Date Sheet Mistake

The date sheet released by the CBSE board initially scheduled the language course exam class 12 for March 3rd, 2026. The board has now postponed this exam and revised the date sheet, rescheduling the exam to March 11th, 2026.

CBSE Date sheet changes

CBSE Revised Date sheet 2025-26 Download PDF

CBSE Board has not made any major changes in the date sheet, so students you do not need to worry, only the changes in the above mentioned papers have been decided last in the date sheet.

CBSE Class 10 Exam Dates 2026 : Subject-Wise Schedule

DateDaySubjectLeave for Next Exam
17 Feb. 2026TuesdayMathematics (Standard/Basic)1 Day
18 Feb. 2026WednesdayHome Science2 Days
21 Feb. 2026SaturdayEnglish (Language & Literature)3 Days
25 Feb. 2026WednesdayScience1 Days
27 Feb. 2026FridayComputer Application, Information Technology, Artificial IntelligenceNo leave
28 Feb. 2026SaturdaySanskrit1 Day
2 Mar. 2026MondayHindi Course A & B4 Days
7 Mar. 2026SaturdaySocial ScienceEnd Exam

Last Words

You all know very well that there isn’t much time left before the exam, and you still need to prepare for all your subjects. If you want to score well, you’ll need to study systematically and according to your timetable.

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Improve Your Strength with MCQ Quiz

Class 10th विषय – हिंदी, अपठित गद्यांश पर आधारित प्रश्नोत्तर MCQ Quiz

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Test Code: HUPL1

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1. उन्नीसवीं सदी में एक प्रसिद्ध फ्रांसीसी मनोचिकित्सक हुए एमिल कुए। उन्होंने आत्म-सम्मोहन के आधार पर स्वास्थ्य लाभ की एक नई विधि की खोज की थी जो खूब चर्चित हुई।

उनका सूत्र था-

‘दिन-ब-दिन मैं बेहतर, और बेहतर होता जा रहा हूँ।’ यह एक प्रयोग था जो ध्यान के नियम पर आधारित था। कुए ने हज़ारों लोगों को इस वाक्य को बार-बार दोहराने के लिए कहकर ठीक किया। जब भी किसी विचार पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है तो यह स्वतः उसे जीवंत बना देता है। विचार इतना प्रभावशाली होता है कि शरीर उसका अनुसरण करता है और वही भाव महसूस करने लगता है।

विचार और शरीर बहुत गहराई से जुड़े हैं। अधिकांश लोग दुःख में जीते हैं या बीमारी को आश्रय देते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रति निराशावादी रवैया विकसित कर लिया है। हमारा अचेतन मन जो कुल मन का 90 प्रतिशत हिस्सा होता है, हमारे विचारों को साकार करता है। यदि हम स्वस्थ विचारों की खेती करेंगे, तो सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगा और यदि हम नकारात्मकता से भरे रहेंगे, तो बीमारी पैदा करके वह हमारा समर्थन करेगा। एक बार जब इसे पूरी तरह से समझ लिया जाता है तो हम शरीर व मन में स्वस्थ तरंगें पैदा करके अपनी बीमारियों को काफ़ी हद तक ठीक कर सकते हैं।

जब शारीरिक और मानसिक घाव भर जाते हैं, तब व्यक्ति स्वस्थ रहता है। कई बीमारियाँ शारीरिक से अधिक मानसिक होती हैं। लोग आस-पास की दवा की दुकान से दवाएँ तो खरीदते हैं पर स्वास्थ्य क्लब में जाकर स्वस्थ रहने की कला नहीं सीखते। लोग बीमारी में निवेश करते हैं, स्वास्थ्य में नहीं। स्वास्थ्य को आदत बनाना चाहिए।

प्रश्न (ग) हमारे विचारों को साकार रूप देने का कार्य किया जाता है-

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2. उन्नीसवीं सदी में एक प्रसिद्ध फ्रांसीसी मनोचिकित्सक हुए एमिल कुए। उन्होंने आत्म-सम्मोहन के आधार पर स्वास्थ्य लाभ की एक नई विधि की खोज की थी जो खूब चर्चित हुई।

उनका सूत्र था-

‘दिन-ब-दिन मैं बेहतर, और बेहतर होता जा रहा हूँ।’ यह एक प्रयोग था जो ध्यान के नियम पर आधारित था। कुए ने हज़ारों लोगों को इस वाक्य को बार-बार दोहराने के लिए कहकर ठीक किया। जब भी किसी विचार पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है तो यह स्वतः उसे जीवंत बना देता है। विचार इतना प्रभावशाली होता है कि शरीर उसका अनुसरण करता है और वही भाव महसूस करने लगता है।

विचार और शरीर बहुत गहराई से जुड़े हैं। अधिकांश लोग दुःख में जीते हैं या बीमारी को आश्रय देते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रति निराशावादी रवैया विकसित कर लिया है। हमारा अचेतन मन जो कुल मन का 90 प्रतिशत हिस्सा होता है, हमारे विचारों को साकार करता है। यदि हम स्वस्थ विचारों की खेती करेंगे, तो सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगा और यदि हम नकारात्मकता से भरे रहेंगे, तो बीमारी पैदा करके वह हमारा समर्थन करेगा। एक बार जब इसे पूरी तरह से समझ लिया जाता है तो हम शरीर व मन में स्वस्थ तरंगें पैदा करके अपनी बीमारियों को काफ़ी हद तक ठीक कर सकते हैं।

जब शारीरिक और मानसिक घाव भर जाते हैं, तब व्यक्ति स्वस्थ रहता है। कई बीमारियाँ शारीरिक से अधिक मानसिक होती हैं। लोग आस-पास की दवा की दुकान से दवाएँ तो खरीदते हैं पर स्वास्थ्य क्लब में जाकर स्वस्थ रहने की कला नहीं सीखते। लोग बीमारी में निवेश करते हैं, स्वास्थ्य में नहीं। स्वास्थ्य को आदत बनाना चाहिए।

प्रश्न (ड़) निम्नलिखित कथन तथा कारण को ध्यान से पढ़िए तथा सही विकल्प का चयन कर लिखिए।

कथन: वर्तमान समय में लोगों के जीवन में एकाकीपन बढ़ रहा है।

कारण: लोगों ने अपने प्रति निराशावादी रवैया विकसित कर लिया है।

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3. बहुत से विद्वानों और चिंतकों ने इस बात को लेकर चिंता प्रकट की है कि भारतीय समाज आधुनिकता से बहुत दूर है और भारत के लोग अपने आप को आधुनिक बनाने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं।

नैतिकता, सौदर्यबोध और अध्यात्म के समान आधुनिकता कोई शाश्वत मूल्य नहीं है। यह कई चीजों का एक सम्मिलित नाम है। औद्योगीकरण आधुनिकता की पहचान है। साक्षरता का सर्वव्यापी प्रसार आधुनिकता की सूचना देता है। नगर सभ्यता का प्राधान्य आधुनिकता का गुण है। सीधी-सादी अर्थव्यवस्था मध्यकालीनता का लक्षण है। आधुनिक देश वह है, जिसकी अर्थव्यवस्था जटिल और प्रसरणशील हो और जो ‘टेक ऑफ’ की स्थिति को पार कर चुकी हो।

आधुनिक समाज मुक्त और मध्यकालीन समाज बंद होता है। बंद समाज यह है जो अन्य समाजों से प्रभाव ग्रहण नहीं करता, जो अपने सदस्यों को भी धन या संस्कृति की दीर्घा में ऊपर उठने की खुली छूट नहीं देता, जो जाति प्रथा और गोत्रवाद से पीड़ित है, जी अंधविश्वासी, गतानुगतिक और संकीर्ण है।

आधुनिक समाज में उन्मुक्तता होती है। उस समाज के लोग अन्य समाजों के लोगों से मिलने जुलने में नहीं घबराते, न वे उन्नति का मार्ग खास जातियों और खास गोत्रों के लिए सीमित रखते हैं। आधुनिक समाज सामरिक दृष्टि से भी बलवान समाज होता है। जो देश अपनी रक्षा के लिए भी लड़ने में असमर्थ है, उसे आधुनिक कहलाने का कोई अधिकार नहीं है। आधुनिक समाज के लोग आलसी और निकम्मे नहीं होते। आधुनिक समाज का एक लक्षण यह भी है कि उसकी हर आदमी के पीछे होने वाली आय अधिक होती है, उसके हर आदमी के पास कोई गंधा वा काम होता है और अवकाश की शिकायत प्रायः हर एक को रहती है।

प्रश्न 3. विद्वानों और चिंतकों ने किस बात के ऊपर चिंता व्यक्त की है?

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4. बहुत से विद्वानों और चिंतकों ने इस बात को लेकर चिंता प्रकट की है कि भारतीय समाज आधुनिकता से बहुत दूर है और भारत के लोग अपने आप को आधुनिक बनाने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं।

नैतिकता, सौदर्यबोध और अध्यात्म के समान आधुनिकता कोई शाश्वत मूल्य नहीं है। यह कई चीजों का एक सम्मिलित नाम है। औद्योगीकरण आधुनिकता की पहचान है। साक्षरता का सर्वव्यापी प्रसार आधुनिकता की सूचना देता है। नगर सभ्यता का प्राधान्य आधुनिकता का गुण है। सीधी-सादी अर्थव्यवस्था मध्यकालीनता का लक्षण है। आधुनिक देश वह है, जिसकी अर्थव्यवस्था जटिल और प्रसरणशील हो और जो ‘टेक ऑफ’ की स्थिति को पार कर चुकी हो।

आधुनिक समाज मुक्त और मध्यकालीन समाज बंद होता है। बंद समाज यह है जो अन्य समाजों से प्रभाव ग्रहण नहीं करता, जो अपने सदस्यों को भी धन या संस्कृति की दीर्घा में ऊपर उठने की खुली छूट नहीं देता, जो जाति प्रथा और गोत्रवाद से पीड़ित है, जी अंधविश्वासी, गतानुगतिक और संकीर्ण है।

आधुनिक समाज में उन्मुक्तता होती है। उस समाज के लोग अन्य समाजों के लोगों से मिलने जुलने में नहीं घबराते, न वे उन्नति का मार्ग खास जातियों और खास गोत्रों के लिए सीमित रखते हैं। आधुनिक समाज सामरिक दृष्टि से भी बलवान समाज होता है। जो देश अपनी रक्षा के लिए भी लड़ने में असमर्थ है, उसे आधुनिक कहलाने का कोई अधिकार नहीं है। आधुनिक समाज के लोग आलसी और निकम्मे नहीं होते। आधुनिक समाज का एक लक्षण यह भी है कि उसकी हर आदमी के पीछे होने वाली आय अधिक होती है, उसके हर आदमी के पास कोई गंधा वा काम होता है और अवकाश की शिकायत प्रायः हर एक को रहती है।

प्रश्न 4. आधुनिक समाज की विशिष्टताओं में शामिल है-

(क) उन्मुक्तता (ख) सामरिक बल (ग) आलस्य

उपरोक्त विकल्पों के आधार पर निम्नलिखित विकल्पों में सही विकल्प का चयन कीजिए-

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5. काम या पेशा खुद बुरा या छोटा-बड़ा नहीं है। कोई भी काम हो जो ईमानदारी से किया जाए और उचित लाभ के अतिरिक्त यदि एक पैसा भी बेईमानी का उसमें नहीं आया तो वह सर्वथा प्रतिष्ठित और सराहना के योग्य है। छोटे से छोटा काम भी यदि ईमानदारी के साथ किया जाए तो कभी बुरा नहीं होता। किसी ऊँची बात को लक्ष्य कर किया गया मेहनत का काम जो अपनी ईमानदारी में बट्टा न लगाता हो बुरा नहीं है। जो लेन-देन में पवित्र और शुचि है, नीतिशास्त्रों ने उसी को पवित्र माना है।

हाथ-पाँव आदि अंग जल से शुद्ध और साफ होते हैं पर मन केवल सत्य से शुद्ध होता है। मन जिसका दृढ़ है और छिपा नहीं वही अपनी गाढ़ी मेहनत की कौड़ी को अपनी करके मानेगा। बेईमानी से अनुचित लाभ का सोना भी है, तो वह मिट्टी का ढेला मानता है। गाढ़ी मेहनत, ईमानदारी और मुस्तैदी ये तीन बातें रोजगारी/सफलता के लिए बहुत आवश्यक है। बहुधा लोग अपनी बदकिस्मती के लिए रोते हैं और पछताते हैं, पर सच पूछो तो बिदकिस्मती से उनका इतना नहीं बिगड़ा जितना उनके आलस्य, बेपरवाही और जी लगा के मेहनत न करने से। कहावत है-भूकता हुआ कुत्ता ज्यादा काम का है, सोते हुए सिंह की अपेक्षा। वास्तव में जो ईमानदार हैं वे अपने जितने काम हैं सबमें स्वच्छता और स्पष्टता रखने में नहीं चूकते और समाज में सभी के विश्वास-पात्र होते हैं।

प्रश्न 4. कैसे व्यक्ति बेईमानी से प्राप्त मूल्यवान वस्तु को भी मि‌ट्टी सदृश मानते हैं?

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6. शिक्षकों को अपने यहाँ बहुत से विशेषणों से संबोधित किया जाता रहा है। शिक्षक को राष्ट्र-निर्माता कहा जाता है। युवा पीढ़ी का सुधारक, मशाल-वाहक और पथ प्रदर्शक भी कहा जाता है। शिक्षक शिक्षा के साथ-साथ अपने शिष्यों को जीवन-कौशल और नैतिक मूल्यों का भी ज्ञान प्रदान करते हैं। मानव जाति के लिए नई सोच और दृष्टिकोण की अपेक्षा भी शिक्षकों से ही की जाती है। शिक्षकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका समाज को सशक्त और समृद्ध बनाने में भी है।

हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन ग्रंथों में जगह-जगह एक आदर्श गुरु के गुणों को वर्णित किया गया है। स्कंद पुराण के गुरु-स्तोत्रम् में तो गुरुओं की तुलना ब्रह्मा, विष्णु और महेश से की गई है तथा गुरु को साक्षात् परब्रह्म माना गया है। एक अच्छे गुरु में गहन ज्ञान, विद्वत्ता, करुणा, नैतिकता व चरित्र, नवीनता, नवाचार, अनुशासनप्रियता और समानता का भाव अपेक्षित है। यही गुण एक गुरु को महान बनाते हैं और शिष्यों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। अपनी सदी के महान कवि और संत कबीरदास जी ने भी कहा है ‘गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि कार्दै खोट’ अर्थात् गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है जो गढ़-गढ़ कर शिष्य की कमियों को दूर करता है। शिक्षक अपने सफल मार्गदर्शन द्वारा शिष्यों को उनकी शक्तियों से परिचित कराते हुए उनके विकास के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। शिक्षक समाज के भविष्य निर्माताओं को तैयार करने में एक अहम् भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न (ड़) कबीरदास जी ने गुरु की तुलना कुम्हार से क्यों की है?

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7. बहुत से विद्वानों और चिंतकों ने इस बात को लेकर चिंता प्रकट की है कि भारतीय समाज आधुनिकता से बहुत दूर है और भारत के लोग अपने आप को आधुनिक बनाने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं।

नैतिकता, सौदर्यबोध और अध्यात्म के समान आधुनिकता कोई शाश्वत मूल्य नहीं है। यह कई चीजों का एक सम्मिलित नाम है। औद्योगीकरण आधुनिकता की पहचान है। साक्षरता का सर्वव्यापी प्रसार आधुनिकता की सूचना देता है। नगर सभ्यता का प्राधान्य आधुनिकता का गुण है। सीधी-सादी अर्थव्यवस्था मध्यकालीनता का लक्षण है। आधुनिक देश वह है, जिसकी अर्थव्यवस्था जटिल और प्रसरणशील हो और जो ‘टेक ऑफ’ की स्थिति को पार कर चुकी हो।

आधुनिक समाज मुक्त और मध्यकालीन समाज बंद होता है। बंद समाज यह है जो अन्य समाजों से प्रभाव ग्रहण नहीं करता, जो अपने सदस्यों को भी धन या संस्कृति की दीर्घा में ऊपर उठने की खुली छूट नहीं देता, जो जाति प्रथा और गोत्रवाद से पीड़ित है, जी अंधविश्वासी, गतानुगतिक और संकीर्ण है।

आधुनिक समाज में उन्मुक्तता होती है। उस समाज के लोग अन्य समाजों के लोगों से मिलने जुलने में नहीं घबराते, न वे उन्नति का मार्ग खास जातियों और खास गोत्रों के लिए सीमित रखते हैं। आधुनिक समाज सामरिक दृष्टि से भी बलवान समाज होता है। जो देश अपनी रक्षा के लिए भी लड़ने में असमर्थ है, उसे आधुनिक कहलाने का कोई अधिकार नहीं है। आधुनिक समाज के लोग आलसी और निकम्मे नहीं होते। आधुनिक समाज का एक लक्षण यह भी है कि उसकी हर आदमी के पीछे होने वाली आय अधिक होती है, उसके हर आदमी के पास कोई गंधा वा काम होता है और अवकाश की शिकायत प्रायः हर एक को रहती है।

प्रश्न 2. शाश्वत मूल्यों में शामिल हैं-

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8. काम या पेशा खुद बुरा या छोटा-बड़ा नहीं है। कोई भी काम हो जो ईमानदारी से किया जाए और उचित लाभ के अतिरिक्त यदि एक पैसा भी बेईमानी का उसमें नहीं आया तो वह सर्वथा प्रतिष्ठित और सराहना के योग्य है। छोटे से छोटा काम भी यदि ईमानदारी के साथ किया जाए तो कभी बुरा नहीं होता। किसी ऊँची बात को लक्ष्य कर किया गया मेहनत का काम जो अपनी ईमानदारी में बट्टा न लगाता हो बुरा नहीं है। जो लेन-देन में पवित्र और शुचि है, नीतिशास्त्रों ने उसी को पवित्र माना है।

हाथ-पाँव आदि अंग जल से शुद्ध और साफ होते हैं पर मन केवल सत्य से शुद्ध होता है। मन जिसका दृढ़ है और छिपा नहीं वही अपनी गाढ़ी मेहनत की कौड़ी को अपनी करके मानेगा। बेईमानी से अनुचित लाभ का सोना भी है, तो वह मिट्टी का ढेला मानता है। गाढ़ी मेहनत, ईमानदारी और मुस्तैदी ये तीन बातें रोजगारी/सफलता के लिए बहुत आवश्यक है। बहुधा लोग अपनी बदकिस्मती के लिए रोते हैं और पछताते हैं, पर सच पूछो तो बिदकिस्मती से उनका इतना नहीं बिगड़ा जितना उनके आलस्य, बेपरवाही और जी लगा के मेहनत न करने से। कहावत है-भूकता हुआ कुत्ता ज्यादा काम का है, सोते हुए सिंह की अपेक्षा। वास्तव में जो ईमानदार हैं वे अपने जितने काम हैं सबमें स्वच्छता और स्पष्टता रखने में नहीं चूकते और समाज में सभी के विश्वास-पात्र होते हैं।

प्रश्न 2. काम या पेशा खुद बुरा नहीं है इसका क्या अभिप्राय है?

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9. उन्नीसवीं सदी में एक प्रसिद्ध फ्रांसीसी मनोचिकित्सक हुए एमिल कुए। उन्होंने आत्म-सम्मोहन के आधार पर स्वास्थ्य लाभ की एक नई विधि की खोज की थी जो खूब चर्चित हुई।

उनका सूत्र था-

‘दिन-ब-दिन मैं बेहतर, और बेहतर होता जा रहा हूँ।’ यह एक प्रयोग था जो ध्यान के नियम पर आधारित था। कुए ने हज़ारों लोगों को इस वाक्य को बार-बार दोहराने के लिए कहकर ठीक किया। जब भी किसी विचार पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है तो यह स्वतः उसे जीवंत बना देता है। विचार इतना प्रभावशाली होता है कि शरीर उसका अनुसरण करता है और वही भाव महसूस करने लगता है।

विचार और शरीर बहुत गहराई से जुड़े हैं। अधिकांश लोग दुःख में जीते हैं या बीमारी को आश्रय देते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रति निराशावादी रवैया विकसित कर लिया है। हमारा अचेतन मन जो कुल मन का 90 प्रतिशत हिस्सा होता है, हमारे विचारों को साकार करता है। यदि हम स्वस्थ विचारों की खेती करेंगे, तो सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगा और यदि हम नकारात्मकता से भरे रहेंगे, तो बीमारी पैदा करके वह हमारा समर्थन करेगा। एक बार जब इसे पूरी तरह से समझ लिया जाता है तो हम शरीर व मन में स्वस्थ तरंगें पैदा करके अपनी बीमारियों को काफ़ी हद तक ठीक कर सकते हैं।

जब शारीरिक और मानसिक घाव भर जाते हैं, तब व्यक्ति स्वस्थ रहता है। कई बीमारियाँ शारीरिक से अधिक मानसिक होती हैं। लोग आस-पास की दवा की दुकान से दवाएँ तो खरीदते हैं पर स्वास्थ्य क्लब में जाकर स्वस्थ रहने की कला नहीं सीखते। लोग बीमारी में निवेश करते हैं, स्वास्थ्य में नहीं। स्वास्थ्य को आदत बनाना चाहिए।

प्रश्न (क) ‘हम स्वस्थ विचारों की खेती करेंगे तो मन सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगा।’ इस पंक्ति का आशय है-

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10. काम या पेशा खुद बुरा या छोटा-बड़ा नहीं है। कोई भी काम हो जो ईमानदारी से किया जाए और उचित लाभ के अतिरिक्त यदि एक पैसा भी बेईमानी का उसमें नहीं आया तो वह सर्वथा प्रतिष्ठित और सराहना के योग्य है। छोटे से छोटा काम भी यदि ईमानदारी के साथ किया जाए तो कभी बुरा नहीं होता। किसी ऊँची बात को लक्ष्य कर किया गया मेहनत का काम जो अपनी ईमानदारी में बट्टा न लगाता हो बुरा नहीं है। जो लेन-देन में पवित्र और शुचि है, नीतिशास्त्रों ने उसी को पवित्र माना है।

हाथ-पाँव आदि अंग जल से शुद्ध और साफ होते हैं पर मन केवल सत्य से शुद्ध होता है। मन जिसका दृढ़ है और छिपा नहीं वही अपनी गाढ़ी मेहनत की कौड़ी को अपनी करके मानेगा। बेईमानी से अनुचित लाभ का सोना भी है, तो वह मिट्टी का ढेला मानता है। गाढ़ी मेहनत, ईमानदारी और मुस्तैदी ये तीन बातें रोजगारी/सफलता के लिए बहुत आवश्यक है। बहुधा लोग अपनी बदकिस्मती के लिए रोते हैं और पछताते हैं, पर सच पूछो तो बिदकिस्मती से उनका इतना नहीं बिगड़ा जितना उनके आलस्य, बेपरवाही और जी लगा के मेहनत न करने से। कहावत है-भूकता हुआ कुत्ता ज्यादा काम का है, सोते हुए सिंह की अपेक्षा। वास्तव में जो ईमानदार हैं वे अपने जितने काम हैं सबमें स्वच्छता और स्पष्टता रखने में नहीं चूकते और समाज में सभी के विश्वास-पात्र होते हैं।

प्रश्न 1. कोई भी रोजगार और पेशा कब प्रतिष्ठित और सराहना के योग्य हो जाता है?

11 / 20

11. उन्नीसवीं सदी में एक प्रसिद्ध फ्रांसीसी मनोचिकित्सक हुए एमिल कुए। उन्होंने आत्म-सम्मोहन के आधार पर स्वास्थ्य लाभ की एक नई विधि की खोज की थी जो खूब चर्चित हुई।

उनका सूत्र था-

‘दिन-ब-दिन मैं बेहतर, और बेहतर होता जा रहा हूँ।’ यह एक प्रयोग था जो ध्यान के नियम पर आधारित था। कुए ने हज़ारों लोगों को इस वाक्य को बार-बार दोहराने के लिए कहकर ठीक किया। जब भी किसी विचार पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है तो यह स्वतः उसे जीवंत बना देता है। विचार इतना प्रभावशाली होता है कि शरीर उसका अनुसरण करता है और वही भाव महसूस करने लगता है।

विचार और शरीर बहुत गहराई से जुड़े हैं। अधिकांश लोग दुःख में जीते हैं या बीमारी को आश्रय देते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रति निराशावादी रवैया विकसित कर लिया है। हमारा अचेतन मन जो कुल मन का 90 प्रतिशत हिस्सा होता है, हमारे विचारों को साकार करता है। यदि हम स्वस्थ विचारों की खेती करेंगे, तो सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगा और यदि हम नकारात्मकता से भरे रहेंगे, तो बीमारी पैदा करके वह हमारा समर्थन करेगा। एक बार जब इसे पूरी तरह से समझ लिया जाता है तो हम शरीर व मन में स्वस्थ तरंगें पैदा करके अपनी बीमारियों को काफ़ी हद तक ठीक कर सकते हैं।

जब शारीरिक और मानसिक घाव भर जाते हैं, तब व्यक्ति स्वस्थ रहता है। कई बीमारियाँ शारीरिक से अधिक मानसिक होती हैं। लोग आस-पास की दवा की दुकान से दवाएँ तो खरीदते हैं पर स्वास्थ्य क्लब में जाकर स्वस्थ रहने की कला नहीं सीखते। लोग बीमारी में निवेश करते हैं, स्वास्थ्य में नहीं। स्वास्थ्य को आदत बनाना चाहिए।

प्रश्न (ख) इस गद्यांश के अनुसार, नकारात्मक विचार जन्म देते हैं –

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12. शिक्षकों को अपने यहाँ बहुत से विशेषणों से संबोधित किया जाता रहा है। शिक्षक को राष्ट्र-निर्माता कहा जाता है। युवा पीढ़ी का सुधारक, मशाल-वाहक और पथ प्रदर्शक भी कहा जाता है। शिक्षक शिक्षा के साथ-साथ अपने शिष्यों को जीवन-कौशल और नैतिक मूल्यों का भी ज्ञान प्रदान करते हैं। मानव जाति के लिए नई सोच और दृष्टिकोण की अपेक्षा भी शिक्षकों से ही की जाती है। शिक्षकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका समाज को सशक्त और समृद्ध बनाने में भी है।

हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन ग्रंथों में जगह-जगह एक आदर्श गुरु के गुणों को वर्णित किया गया है। स्कंद पुराण के गुरु-स्तोत्रम् में तो गुरुओं की तुलना ब्रह्मा, विष्णु और महेश से की गई है तथा गुरु को साक्षात् परब्रह्म माना गया है। एक अच्छे गुरु में गहन ज्ञान, विद्वत्ता, करुणा, नैतिकता व चरित्र, नवीनता, नवाचार, अनुशासनप्रियता और समानता का भाव अपेक्षित है। यही गुण एक गुरु को महान बनाते हैं और शिष्यों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। अपनी सदी के महान कवि और संत कबीरदास जी ने भी कहा है ‘गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि कार्दै खोट’ अर्थात् गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है जो गढ़-गढ़ कर शिष्य की कमियों को दूर करता है। शिक्षक अपने सफल मार्गदर्शन द्वारा शिष्यों को उनकी शक्तियों से परिचित कराते हुए उनके विकास के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। शिक्षक समाज के भविष्य निर्माताओं को तैयार करने में एक अहम् भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न (क) शिक्षक शिक्षा के साथ-साथ शिष्यों को प्रदान करता है –

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13. काम या पेशा खुद बुरा या छोटा-बड़ा नहीं है। कोई भी काम हो जो ईमानदारी से किया जाए और उचित लाभ के अतिरिक्त यदि एक पैसा भी बेईमानी का उसमें नहीं आया तो वह सर्वथा प्रतिष्ठित और सराहना के योग्य है। छोटे से छोटा काम भी यदि ईमानदारी के साथ किया जाए तो कभी बुरा नहीं होता। किसी ऊँची बात को लक्ष्य कर किया गया मेहनत का काम जो अपनी ईमानदारी में बट्टा न लगाता हो बुरा नहीं है। जो लेन-देन में पवित्र और शुचि है, नीतिशास्त्रों ने उसी को पवित्र माना है।

हाथ-पाँव आदि अंग जल से शुद्ध और साफ होते हैं पर मन केवल सत्य से शुद्ध होता है। मन जिसका दृढ़ है और छिपा नहीं वही अपनी गाढ़ी मेहनत की कौड़ी को अपनी करके मानेगा। बेईमानी से अनुचित लाभ का सोना भी है, तो वह मिट्टी का ढेला मानता है। गाढ़ी मेहनत, ईमानदारी और मुस्तैदी ये तीन बातें रोजगारी/सफलता के लिए बहुत आवश्यक है। बहुधा लोग अपनी बदकिस्मती के लिए रोते हैं और पछताते हैं, पर सच पूछो तो बिदकिस्मती से उनका इतना नहीं बिगड़ा जितना उनके आलस्य, बेपरवाही और जी लगा के मेहनत न करने से। कहावत है-भूकता हुआ कुत्ता ज्यादा काम का है, सोते हुए सिंह की अपेक्षा। वास्तव में जो ईमानदार हैं वे अपने जितने काम हैं सबमें स्वच्छता और स्पष्टता रखने में नहीं चूकते और समाज में सभी के विश्वास-पात्र होते हैं।

प्रश्न 5. ‘भूकता हुआ कुत्ता ज्यादा काम का है, सोते हुए सिंह की अपेक्षा कहावत का अर्थ है-

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14. शिक्षकों को अपने यहाँ बहुत से विशेषणों से संबोधित किया जाता रहा है। शिक्षक को राष्ट्र-निर्माता कहा जाता है। युवा पीढ़ी का सुधारक, मशाल-वाहक और पथ प्रदर्शक भी कहा जाता है। शिक्षक शिक्षा के साथ-साथ अपने शिष्यों को जीवन-कौशल और नैतिक मूल्यों का भी ज्ञान प्रदान करते हैं। मानव जाति के लिए नई सोच और दृष्टिकोण की अपेक्षा भी शिक्षकों से ही की जाती है। शिक्षकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका समाज को सशक्त और समृद्ध बनाने में भी है।

हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन ग्रंथों में जगह-जगह एक आदर्श गुरु के गुणों को वर्णित किया गया है। स्कंद पुराण के गुरु-स्तोत्रम् में तो गुरुओं की तुलना ब्रह्मा, विष्णु और महेश से की गई है तथा गुरु को साक्षात् परब्रह्म माना गया है। एक अच्छे गुरु में गहन ज्ञान, विद्वत्ता, करुणा, नैतिकता व चरित्र, नवीनता, नवाचार, अनुशासनप्रियता और समानता का भाव अपेक्षित है। यही गुण एक गुरु को महान बनाते हैं और शिष्यों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। अपनी सदी के महान कवि और संत कबीरदास जी ने भी कहा है ‘गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि कार्दै खोट’ अर्थात् गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है जो गढ़-गढ़ कर शिष्य की कमियों को दूर करता है। शिक्षक अपने सफल मार्गदर्शन द्वारा शिष्यों को उनकी शक्तियों से परिचित कराते हुए उनके विकास के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। शिक्षक समाज के भविष्य निर्माताओं को तैयार करने में एक अहम् भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न (घ) शिक्षक को पथ – प्रदर्शक क्यों कहा जाता है?

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15. शिक्षकों को अपने यहाँ बहुत से विशेषणों से संबोधित किया जाता रहा है। शिक्षक को राष्ट्र-निर्माता कहा जाता है। युवा पीढ़ी का सुधारक, मशाल-वाहक और पथ प्रदर्शक भी कहा जाता है। शिक्षक शिक्षा के साथ-साथ अपने शिष्यों को जीवन-कौशल और नैतिक मूल्यों का भी ज्ञान प्रदान करते हैं। मानव जाति के लिए नई सोच और दृष्टिकोण की अपेक्षा भी शिक्षकों से ही की जाती है। शिक्षकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका समाज को सशक्त और समृद्ध बनाने में भी है।

हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन ग्रंथों में जगह-जगह एक आदर्श गुरु के गुणों को वर्णित किया गया है। स्कंद पुराण के गुरु-स्तोत्रम् में तो गुरुओं की तुलना ब्रह्मा, विष्णु और महेश से की गई है तथा गुरु को साक्षात् परब्रह्म माना गया है। एक अच्छे गुरु में गहन ज्ञान, विद्वत्ता, करुणा, नैतिकता व चरित्र, नवीनता, नवाचार, अनुशासनप्रियता और समानता का भाव अपेक्षित है। यही गुण एक गुरु को महान बनाते हैं और शिष्यों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। अपनी सदी के महान कवि और संत कबीरदास जी ने भी कहा है ‘गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि कार्दै खोट’ अर्थात् गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है जो गढ़-गढ़ कर शिष्य की कमियों को दूर करता है। शिक्षक अपने सफल मार्गदर्शन द्वारा शिष्यों को उनकी शक्तियों से परिचित कराते हुए उनके विकास के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। शिक्षक समाज के भविष्य निर्माताओं को तैयार करने में एक अहम् भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न (ग) निम्नलिखित कथन तथा कारण को ध्यानपूर्वक पढ़कर उचित विकल्प का चयन कीजिए:

कथन: मानव जाति के लिए नई सोच और दृष्टिकोण विकसित करना शिक्षक का दायित्व है।

कारण: हमारी ज्ञान परंपरा और ग्रंथों में गुरु को महान बताया गया है।

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16. काम या पेशा खुद बुरा या छोटा-बड़ा नहीं है। कोई भी काम हो जो ईमानदारी से किया जाए और उचित लाभ के अतिरिक्त यदि एक पैसा भी बेईमानी का उसमें नहीं आया तो वह सर्वथा प्रतिष्ठित और सराहना के योग्य है। छोटे से छोटा काम भी यदि ईमानदारी के साथ किया जाए तो कभी बुरा नहीं होता। किसी ऊँची बात को लक्ष्य कर किया गया मेहनत का काम जो अपनी ईमानदारी में बट्टा न लगाता हो बुरा नहीं है। जो लेन-देन में पवित्र और शुचि है, नीतिशास्त्रों ने उसी को पवित्र माना है।

हाथ-पाँव आदि अंग जल से शुद्ध और साफ होते हैं पर मन केवल सत्य से शुद्ध होता है। मन जिसका दृढ़ है और छिपा नहीं वही अपनी गाढ़ी मेहनत की कौड़ी को अपनी करके मानेगा। बेईमानी से अनुचित लाभ का सोना भी है, तो वह मिट्टी का ढेला मानता है। गाढ़ी मेहनत, ईमानदारी और मुस्तैदी ये तीन बातें रोजगारी/सफलता के लिए बहुत आवश्यक है। बहुधा लोग अपनी बदकिस्मती के लिए रोते हैं और पछताते हैं, पर सच पूछो तो बिदकिस्मती से उनका इतना नहीं बिगड़ा जितना उनके आलस्य, बेपरवाही और जी लगा के मेहनत न करने से। कहावत है-भूकता हुआ कुत्ता ज्यादा काम का है, सोते हुए सिंह की अपेक्षा। वास्तव में जो ईमानदार हैं वे अपने जितने काम हैं सबमें स्वच्छता और स्पष्टता रखने में नहीं चूकते और समाज में सभी के विश्वास-पात्र होते हैं।

प्रश्न 3. हाथ-पाँव की पवित्रता का संबंध यदि जल से है तो मन की पवित्रता का संबंध है-

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17. बहुत से विद्वानों और चिंतकों ने इस बात को लेकर चिंता प्रकट की है कि भारतीय समाज आधुनिकता से बहुत दूर है और भारत के लोग अपने आप को आधुनिक बनाने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं।

नैतिकता, सौदर्यबोध और अध्यात्म के समान आधुनिकता कोई शाश्वत मूल्य नहीं है। यह कई चीजों का एक सम्मिलित नाम है। औद्योगीकरण आधुनिकता की पहचान है। साक्षरता का सर्वव्यापी प्रसार आधुनिकता की सूचना देता है। नगर सभ्यता का प्राधान्य आधुनिकता का गुण है। सीधी-सादी अर्थव्यवस्था मध्यकालीनता का लक्षण है। आधुनिक देश वह है, जिसकी अर्थव्यवस्था जटिल और प्रसरणशील हो और जो ‘टेक ऑफ’ की स्थिति को पार कर चुकी हो।

आधुनिक समाज मुक्त और मध्यकालीन समाज बंद होता है। बंद समाज यह है जो अन्य समाजों से प्रभाव ग्रहण नहीं करता, जो अपने सदस्यों को भी धन या संस्कृति की दीर्घा में ऊपर उठने की खुली छूट नहीं देता, जो जाति प्रथा और गोत्रवाद से पीड़ित है, जी अंधविश्वासी, गतानुगतिक और संकीर्ण है।

आधुनिक समाज में उन्मुक्तता होती है। उस समाज के लोग अन्य समाजों के लोगों से मिलने जुलने में नहीं घबराते, न वे उन्नति का मार्ग खास जातियों और खास गोत्रों के लिए सीमित रखते हैं। आधुनिक समाज सामरिक दृष्टि से भी बलवान समाज होता है। जो देश अपनी रक्षा के लिए भी लड़ने में असमर्थ है, उसे आधुनिक कहलाने का कोई अधिकार नहीं है। आधुनिक समाज के लोग आलसी और निकम्मे नहीं होते। आधुनिक समाज का एक लक्षण यह भी है कि उसकी हर आदमी के पीछे होने वाली आय अधिक होती है, उसके हर आदमी के पास कोई गंधा वा काम होता है और अवकाश की शिकायत प्रायः हर एक को रहती है।

प्रश्न 1. गद्यांश के आधार पर सही तथ्य को चुनिए।

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18. बहुत से विद्वानों और चिंतकों ने इस बात को लेकर चिंता प्रकट की है कि भारतीय समाज आधुनिकता से बहुत दूर है और भारत के लोग अपने आप को आधुनिक बनाने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं।

नैतिकता, सौदर्यबोध और अध्यात्म के समान आधुनिकता कोई शाश्वत मूल्य नहीं है। यह कई चीजों का एक सम्मिलित नाम है। औद्योगीकरण आधुनिकता की पहचान है। साक्षरता का सर्वव्यापी प्रसार आधुनिकता की सूचना देता है। नगर सभ्यता का प्राधान्य आधुनिकता का गुण है। सीधी-सादी अर्थव्यवस्था मध्यकालीनता का लक्षण है। आधुनिक देश वह है, जिसकी अर्थव्यवस्था जटिल और प्रसरणशील हो और जो ‘टेक ऑफ’ की स्थिति को पार कर चुकी हो।

आधुनिक समाज मुक्त और मध्यकालीन समाज बंद होता है। बंद समाज यह है जो अन्य समाजों से प्रभाव ग्रहण नहीं करता, जो अपने सदस्यों को भी धन या संस्कृति की दीर्घा में ऊपर उठने की खुली छूट नहीं देता, जो जाति प्रथा और गोत्रवाद से पीड़ित है, जी अंधविश्वासी, गतानुगतिक और संकीर्ण है।

आधुनिक समाज में उन्मुक्तता होती है। उस समाज के लोग अन्य समाजों के लोगों से मिलने जुलने में नहीं घबराते, न वे उन्नति का मार्ग खास जातियों और खास गोत्रों के लिए सीमित रखते हैं। आधुनिक समाज सामरिक दृष्टि से भी बलवान समाज होता है। जो देश अपनी रक्षा के लिए भी लड़ने में असमर्थ है, उसे आधुनिक कहलाने का कोई अधिकार नहीं है। आधुनिक समाज के लोग आलसी और निकम्मे नहीं होते। आधुनिक समाज का एक लक्षण यह भी है कि उसकी हर आदमी के पीछे होने वाली आय अधिक होती है, उसके हर आदमी के पास कोई गंधा वा काम होता है और अवकाश की शिकायत प्रायः हर एक को रहती है।

प्रश्न 5. एक बंद समाज की विशेषताओं में किसे नहीं रखा जाएगा?

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19. शिक्षकों को अपने यहाँ बहुत से विशेषणों से संबोधित किया जाता रहा है। शिक्षक को राष्ट्र-निर्माता कहा जाता है। युवा पीढ़ी का सुधारक, मशाल-वाहक और पथ प्रदर्शक भी कहा जाता है। शिक्षक शिक्षा के साथ-साथ अपने शिष्यों को जीवन-कौशल और नैतिक मूल्यों का भी ज्ञान प्रदान करते हैं। मानव जाति के लिए नई सोच और दृष्टिकोण की अपेक्षा भी शिक्षकों से ही की जाती है। शिक्षकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका समाज को सशक्त और समृद्ध बनाने में भी है।

हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन ग्रंथों में जगह-जगह एक आदर्श गुरु के गुणों को वर्णित किया गया है। स्कंद पुराण के गुरु-स्तोत्रम् में तो गुरुओं की तुलना ब्रह्मा, विष्णु और महेश से की गई है तथा गुरु को साक्षात् परब्रह्म माना गया है। एक अच्छे गुरु में गहन ज्ञान, विद्वत्ता, करुणा, नैतिकता व चरित्र, नवीनता, नवाचार, अनुशासनप्रियता और समानता का भाव अपेक्षित है। यही गुण एक गुरु को महान बनाते हैं और शिष्यों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। अपनी सदी के महान कवि और संत कबीरदास जी ने भी कहा है ‘गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि कार्दै खोट’ अर्थात् गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है जो गढ़-गढ़ कर शिष्य की कमियों को दूर करता है। शिक्षक अपने सफल मार्गदर्शन द्वारा शिष्यों को उनकी शक्तियों से परिचित कराते हुए उनके विकास के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। शिक्षक समाज के भविष्य निर्माताओं को तैयार करने में एक अहम् भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न (ख) गुरु को ब्रह्मा क्यों कहा गया है?

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20. उन्नीसवीं सदी में एक प्रसिद्ध फ्रांसीसी मनोचिकित्सक हुए एमिल कुए। उन्होंने आत्म-सम्मोहन के आधार पर स्वास्थ्य लाभ की एक नई विधि की खोज की थी जो खूब चर्चित हुई।

उनका सूत्र था-

‘दिन-ब-दिन मैं बेहतर, और बेहतर होता जा रहा हूँ।’ यह एक प्रयोग था जो ध्यान के नियम पर आधारित था। कुए ने हज़ारों लोगों को इस वाक्य को बार-बार दोहराने के लिए कहकर ठीक किया। जब भी किसी विचार पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है तो यह स्वतः उसे जीवंत बना देता है। विचार इतना प्रभावशाली होता है कि शरीर उसका अनुसरण करता है और वही भाव महसूस करने लगता है।

विचार और शरीर बहुत गहराई से जुड़े हैं। अधिकांश लोग दुःख में जीते हैं या बीमारी को आश्रय देते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रति निराशावादी रवैया विकसित कर लिया है। हमारा अचेतन मन जो कुल मन का 90 प्रतिशत हिस्सा होता है, हमारे विचारों को साकार करता है। यदि हम स्वस्थ विचारों की खेती करेंगे, तो सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगा और यदि हम नकारात्मकता से भरे रहेंगे, तो बीमारी पैदा करके वह हमारा समर्थन करेगा। एक बार जब इसे पूरी तरह से समझ लिया जाता है तो हम शरीर व मन में स्वस्थ तरंगें पैदा करके अपनी बीमारियों को काफ़ी हद तक ठीक कर सकते हैं।

जब शारीरिक और मानसिक घाव भर जाते हैं, तब व्यक्ति स्वस्थ रहता है। कई बीमारियाँ शारीरिक से अधिक मानसिक होती हैं। लोग आस-पास की दवा की दुकान से दवाएँ तो खरीदते हैं पर स्वास्थ्य क्लब में जाकर स्वस्थ रहने की कला नहीं सीखते। लोग बीमारी में निवेश करते हैं, स्वास्थ्य में नहीं। स्वास्थ्य को आदत बनाना चाहिए।

प्रश्न (घ) ‘लोग बीमारी में निवेश करते हैं, स्वास्थ्य में नहीं क्या अभिप्राय है?

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When was the CBSE Revised Date Sheet 2026 released?

CBSE released the revised date sheet for Class 12 on 31 December 2025. In this, the exam date for some subjects (like Tibetan, German, NCC etc.) has been changed from 3 March 2026 to 11 March 2026.

When will CBSE Class 10 Board Exams 2026 be held?

Phase 1 (Main Exam) will begin on February 17, 2026, and will continue until March 11, 2026. Phase 2 (Improvement/Optional) will be held in May 2026 (around May 15 to June 1).

When will CBSE Class 10 Admit Card 2026 be released?

The Admit Card will be released in the first week of February 2026 (approximately around 2 February 2026). You can get it from your school with principal signature, school stamp.

When will CBSE Class 10 Result 2026 be released?

The results are expected to be declared by the end of May 2026 or the first week of June 2026 (as in previous years). Check official updates on cbse.gov.in.

Will there be two exams in CBSE Class 10 from 2026?

Yes, from 2026, CBSE has introduced a two-board exam system for Class 10. The first (Phase 1) is compulsory in February-March, and the second (Phase 2) is optional (for improvement or compartment) in May. The best score will count.

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